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Bhrashtachar Ek Samasya Essay In Marathi Language

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निबंध नंबर : 01 

भ्रष्टाचार एक समस्या 

Bhrashtachar Ek Samasya

भ्रष्टाचार से तात्पर्य ऐसे आचरण से है जिसमें मनुष्य भ्रष्ट आचरण करने को प्रेरित होता है अथवा उसे प्रोत्साहित करता है। यह मानव का सहज गुण है। लोग इससे शायद ही अछुते रह पाएँ हो वे किसी न किसी रूप में दैनिक भ्रस्टाचार के अवश्य साक्षी होते हैं।

आज पूरे विश्व का शायद ही कोई देश बचा हो जो भ्रष्टाचार से बचा हो । पूरे विश्व में भ्रष्टाचार ने अपनी पैठ बना ली है। भारत, चीन और अफ्रिकन देशो में तो यह विकराल रूप में प्रकट होती रही है। भ्रष्टाचारी स्वभाव व प्रवृत्ति का जन्म मानव में कब और कैसे हुआ, इसका अंदाजा लगाना तो संभव नहीं है लेकिन यह माना जा सकता है कि मानव की तीव्र जिज्ञासा तथा अति उत्सुकता ने इसे जन्म दिया होगा। अब प्रश्न यह उठता है कि, आखिर भ्रष्टाचार क्यों पनपता है और इसका निदान कैसे संभव है? इसके मूल में एक ही बात है कि वैसे लोग भ्रष्टाचार के भागी बनते हैं जो अपना कार्य गलत तरीके से करवाना चाहते हैं। यह सब भारत जैसे विकासशील देशों में सरकारी कार्यालयों में सर्वाधिक दृश्टिगोचर होता है। लोगों द्वारा सरकारी कर्मचारियों तथा अफसरों को अपना काम जल्दी करवाने या गलत तरीके से करवाने हेतू उपहार अथवा पैसों की पेषकष की जाती है। ज्यादातर मामलों में तो विभागों के दलालों द्वारा विभिन्न कार्यों के लिए दर निर्धारित कर दिए जाते हैं, जिसमें नीचे से उपर तक के सभी कर्मचारियों का हिस्सा होता है।

हमारे राष्ट्र के नेताओं ने तो भ्रष्टाचार की नई पराकाश्ठा ही लिख दी है । चारा घोटाला, बोफोर्स मामला, तहलका कांड, कोयला आबंटन घोटाला, 2जी घोटाला आदि तो हमारे राष्ट्र के महान घोटालों में दर्ज हैं। नेताओं तथा अफसरों की मिलीभगत ने तो देशवासियों का अपार पैसा भ्रष्टाचारियों के हाथों सुपुर्द कर दिया है। स्विस बैंक, जर्मन बैंक आदि में गलत तरीके से अरबों रूपये जमा हैं। हमारे नेतागण तथा सरकार इस काले धन के खुलासे और इसके भारत आगमन से डरती है, क्योंकि इससे सैकड़ों बड़े नाम सामने आ जाएँगे। हमारी न्यायपालिका भी भ्रष्टाचार के संक्रमण से बची नहीं हैं। पैसों के बल पर कई गलत फैसले लिए दिये गए हैं।

आज भारत सहित पूरे विश्व यदि भ्रष्टाचाररूपी रोग से मुक्त कराना है तो आज के युवा पीढ़ी को आगे आना होगा। समाज में व्याप्त रोग को मिलजुल कर मिटाना होगा। हमें विद्यालयी स्तर से ही बच्चों को इससे दूर रहने को प्रेरित करना होगा और सरकार को कई कड़े कानून बनाने होंगे। इस प्रकार हम एक बेहतर कल की उम्मीद कर सकते हैं।

 

निबंध नंबर : 02 

 

लोकतंत्र और भ्रष्टाचार

Loktantra Aur Bhrashtachar

समान्यतया भ्रष्टाचार को जीवन, समाज, जाति, धर्म, नीति और राजनीति के किसी वाद विशेष के साथ नहीं जोड़ा जा सकता।  वह किसी भी क्षेत्र में जन्म लेकर पल, पनप कर फल-फूल सकता है। यह भी एक सर्वमान्य तथ्य है कि आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में यह भ्रष्टाचार नामक जीव सीना फैलाए निशंक एंव मुक्त भाव से विचर रहा है। अत: धर्म, समाज, नीति, राजनीति आदि किसी भी क्षेत्र में इसको भेंट-चढ़ाए बिना कोई भी व्यक्ति एक कदम भी नहीं चल सकता। फिर भी चरम सत्य यही माना और कहा जाता है कि भ्रष्टाचार वास्तव में लोकतंत्र की तो ओरस संतान है। लोकतंत्र में इसका जन्म स्वत: ही होकर इसे हर स्तर पर, हर प्रकार से फल-फूलकर विकास पाने का उचित अवसर पर्याप्त मात्रा में मिलता रहता है। इसी कारण आज सर्वश्रेष्ठ मानी जाने वाली लोतंत्री शासन-व्यवस्था सर्वाधिक भ्रष्ट, निकृष्ट और अग्राह्य मानी जाती है। जन-मानस इस व्यवस्था के विकल्प खोजने-पाने की दिशा में सुचेष्ट हो गया है। इधर लोकतंत्र और भ्रष्टाचार हैं कि दोनों एक-दूसरे के शब्द एंव पर्यायवाची बनकर रह गए हैं।

लोकतंत्र में कहने के लिए तो ‘लोक’ या ‘जन’ की ही प्रधानता एंव महत्व हुआ करता है। पर विगत अनुभवों से देखने में यह आ रहा है कि इसमें सर्वाधिक दुर्गति यदि किसी की हो रही है तो वह जन कही ही हो रही है। लोकतंत्र में जन मा मूल्य एंव महत्व कभी यदि कुछ देर के लिए, वह भी निहित स्वार्थी और उपेक्षापूर्ण दृष्टि से अंकित भी किया जाता है, तो चुनाव के चौदह-पंद्रह दिनों ही। वह भी इसलिए कि उसका वोट ऐंठा और डकारा जा सके। उसके बाद निर्वाचित व्यक्ति, उनकी सरकारी, उनकी लंबी-चौड़ी सरकार कारकुनों को इस बात की कतई कोई चिंता नहीं रहा करता कि बेचारा ‘लोक’ या ‘जन’ कहां किस हालत में अपने दिन काट रहा है। अपने छोटे-छोटे काम करवाने के लिए भी उसे छोटे-बड़े सभी के सामने गिड़गिड़ाते हुए भी रिश्वत देने को विवश होना पड़ता है कि जिन्हें झपकी मारते ही कर देने के नेताओ ंद्वारा चुनाव के दिनों उनसे वायद किए गए होते हैं। सो लोकतंत्र में तंत्र तो अवश्य रहता है पर लोक की परवाह कतई नहीं की जाती। क्योंकि तंत्र पर बड़े-बड़े नाग-कुंडली मारे बैठे रहते हैंख् उसके आसपास अपनी लंबी जिब्हांए लपारेते मगरमच्छ घूमते रहा करते हैं। इसलिए ‘लोक’ या ‘जन’ वहां तक पहुंच नहीं पाता।

लोकतंत्र में चुनावी व्यूह-चक्र में से निकलने के लिए तरह-तरह के तिकड़म की तिकड़मियों की आवश्यकता पड़ा करती है। इन्हें केवल अर्थ-बल से ही पाला जा सकता है। लांकतंत्र वादी चुनाव लडऩे वालों को पैसा बड़े-बड़े हवालाबाजों से चंदे के रूप में प्राप्त होता है। बस फिर क्या है? एक बाद चंदा-धन देकर देने वाले अगले पांच वर्षों तक बेचारे लोक का रक्त निचोडऩे रहने की खुली छूट पा लेते हैं। फलस्वरूप महंगाई के नाम पर आम जनता को वो गुमराह रख भ्रष्ट लोकतंत्र खुलेवदों लुटने ही देता है, दूसरी ओर बैंक घोटाले, प्रतिभूति घाटाले, बोफोर्स घोटाले, चारा घाटाले,, चीनी घाटाले, आवास घोटाले भी भीतर ही भीतर चलकर बेचारे ‘जन’ का चोषण-शोषण करते रहते हैं। इसी कारण तो आज राजनीति में भले लोगों का तो सर्वथा अकाल पडऩे लगा है जबकि तंदूरबाजो, चाकू-बंदूक बाजों या इस प्रकार के लोगों को शरण दे पाने में समथ्र लोगों का निरंतर आगमन हो रहा है।

आज का निर्वाचित या निर्वाचन के लिए उत्सुक सदस्यों की सूचि उठाकर देखिए। आधे से अधिक ऐसे नाम मिलेंगे कि जो किसी-न-किसी तरह से दागी हैं। कइयों पर कत्ल तक के, चोरी-डकैती, राहजनी तक के, अपहरण आदि के मुकदमे चल रहे होंगे। इतना ही नहीं, ऐसा मजाक केवल लोकतं9 में ही संभव हो सकता है कि दस-बीस साल की सजा पाकर भोगने वाला व्यक्ति भी यहां चुनाव में खड़ा होकर जीत भी सकता है। यानि लोकतंत्र स्वंय तो भ्रष्ट होता ही है, इसका संविधान भी भ्रष्टों को, धर्म-समाज जातिवाद आदि को खुलकर खेलने की छूट दे दिया करता है।

आज रिश्वतखोरी, भाई-भतीजावाद, काला बाजार, करवंचना, स्मगलिंग करना , मिलावटी माल बेचना, बिना टेंडर कुछ भी बांटकर अफसरों को मालामाल कर देना, बिना लिए-दिए रोगियों का उपचार और थानों में शिकायत तक न करना जैसी भ्रष्टाचारी बातें तो आम हो रह गई हैं। जब राष्ट्र के कर्णधार कहे जाने वाले लोग नोटों से भरी अटैचियां तक बिना डकार लिए हजम कर सकते हैं तो उनकी देखा-देखी करने वाले छोटों की तो बात ही क्या। सो स्पष्ट है कि कहने को तो भारत संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यह भी स्पष्ट है कि पिछले चार-पांच वर्षों में इस लोकतंत्र ने भ्रष्टाचार के सारे रिकॉर्ड भी तोड़ दिए हैं। यानी लोकतंत्र का अर्थ ही खुला भ्रष्टाचार बना दिया है। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि इससे बचा कैसे जाए? हमारे विचार में लोकतंत्र की मूल अवधारणा तो वास्तव में अच्छी है। पर वह आज के भ्रष्ट मानसिकता वाले युग के अनुकूल कतई नहीं रह गई। इसलिए आज के सभी दलों के सभी-नेताओं को तो बदलने की जरूरत है ही, कठोर बनकर तंत्र का परिष्कार करना भी बहुत ही आवश्यक है। संविधान भी पुराना तथा अनेक छिद्रों वाला हो चुका है। आवश्यकता है कि ऐसे निस्वार्थ जन-नेताओं और कसे हुए संविधान की कि जो हर प्रकार के भ्रष्टाचार की धज्जियां उड़ा पाने में समर्थ हो। संभव है, ऐसा करके लोकतंत्र को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाई जा सके। यों लोक सीमित तानाशाही की बात भी करते हैं। यदि नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसा या सरदार पटेल जैसा व्यक्तित्व प्राप्त हो जाए, तो कुछ समय के लिए वह भी बुरा नहीं।

निबंध नंबर : 03

 

भ्रष्टाचार 

Bhrashtachar

प्रस्तावना- भ्रष्टाचार संस्कृत भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है- भ्रष्ट़आचार। भ्रष्ट का अर्थ है-नीचे, गिरा हुआ जबकि आचार का अर्थ है आचरण। इस प्रकार भ्रष्टाचार का अर्थ है- गिरा हुआ आचरण। सामान्य शब्दों में, भ्रष्टाचार का अर्थ इस प्रकार है- एक ऐसा व्यक्ति जिसने अपने कर्तव्य की अवहेलना करके निजी स्वार्थ के लिए कुछ कार्य किया है, स्वतन्त्र भारत में भ्रष्टाचारी शब्द प्रायः नेताओं, जमाखोरों, सरकारी कर्मचारियों तथा चोरबाजारियों आदि के लिए प्रयोग किया जा रहा है।

                                भ्रष्टाचार के रूप- भ्रष्टाचार के अनेक रूप हैं, तथा इसके करने वाले विभिन्न तरीकों से भ्रष्टाचार करते हैं, जैसे-दुकानदार से आपने हल्दी मांगी उसने हल्दी में मुल्तानी मिट्टी भरकर अपना लाभ कमाया। इस प्रकार की मिलावट ही भ्रष्टाचार कहलाती है।

                                पिछले दिनों बिहार में भ्रष्टाचार का एक नया मामला प्रकाश में आया है, जिसका नाम यूरिया आयात घोटाला है। इस घोटाले में केन्द्र के कुछ मंत्रियों के नाम भी शामिल हैं।

                                भ्रष्टाचार क्यों?- भ्रष्टाचार करने की नौबत तब आती है, जब मनुष्य की लालसाएं इतनी बढ़ जाती हैं, कि वे उनको पूरा करने के लिए भ्रष्टाचार की शरण लेते हैं। हमारे देश के नेता भी यह नहीं सोचते कि वे तो अपना भरपूर जीवन जी चुके हैं, परन्तु भ्रष्टाचार करके वे दूसरें नवयुवकों का जीवन अपने जरा से धन मोह के लिए क्यों बर्बाद कर रहे हैं।

                भ्रष्टाचार मिटाने का प्रयास- रफी साहब की खाद्य नीति को लोगों द्वारा आज भी याद किया जाता है। उन्होनें उत्तर प्रदेश के राजस्व विभाग में मंत्री के रूप में कार्य किये और भ्रष्टाचार पर अकुंश लगाया।

                                आज भ्रष्टाचार हमारे देश की एक महत्वपूर्ण समस्या बन गई है जिसे रोकने के लिए निम्न बातों का प्रयोग करना आवश्यक है-

                (1) सर्वप्रथम लोकपालों को प्रत्येक राज्य केन्द्रशासित प्रदेश तथा केन्द्र में अविलम्ब  नियुक्त किया जाए, जो प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी हो। उसके कार्यक्षेत्र ने प्रधानमन्त्री तक सम्मिलित किया जाना चाहिए।

                (2) निर्वाचन व्यवस्था को और भी आसान और सस्ती बनायी जाए जिससे समाज सेवा का लोककल्याण से जुड़े लोग भी चुनावों में भाग ले सकें।

                (3) बड़े नेता से लेकर आम जनता तक जो व्यक्ति भ्रष्टाचार का आरोपी है, उसे सख्त-से-सख्त सजा दी जाए।

                आधुनिक युग में भ्रष्टाचारियों को महिमामण्डित करने तथा उन्हें ऊंचे-से-ऊंचे पद पर बिठाने का रिवाज चल रहा है, तथा लोक जातिवाद प्रभाव के द्वारा ऐसे लोगों का बहिष्कार नहीं करते, बल्कि उन्हें वोट देकर ऊंचे आसन पर बिठाकर उनकी पूजा करते हैं।

                                भ्रष्टाचारियों के खिलाफ न्यायपालिका के साथ-साथ समाज को भी अपना दायित्व याद रखना चाहिए। भ्रष्टाचारियों के खिलाफ जनाक्रोश प्रकट करने में समाज को तनिक भी संकोच नहीं करना चाहिए।

                                उपसंहार- यह बात सत्य है कि सामाजिक बहिष्कार कानून से भी अधिक उपयोगी सिद्ध होता है। उन्हेें ऐेसे लोगो के खिलाफ जगह-जगह प्रदर्शन तथा आन्दोलन करने चाहिएं जिसे देखकर भ्रष्टाचारी यह ज्ञान सकें कि बुरे व काले कारनामें करने वालों को कभी भी माफ नहीं किया जायेगा।

April 1, 2016evirtualguru_ajaygourHindi (Sr. Secondary), LanguagesNo CommentHindi Essay

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